#संस्कृतदिवसस्य
हार्दिक्यः शुभकामनाः
संस्कृतं न केवला भाषा अपितु भारतीयतायाः प्रकाशिका संस्कृतेश्च
संपोषिका अपि वर्तते। एषा वैचारिकोन्नतेः साधनमपि अस्ति। मातृवत् वात्सल्यं
प्रदर्शयति। बन्धुवत् सहाय्यतत्परा भवति। भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका अस्ति। पितृवत्
वैचारिकोन्नतिशिखरे स्वात्मजान् द्रष्टुं ययते। मित्रवत् विवेकं जनयति। तस्मात्
सर्वैः एषा अवश्यम् आश्रयणीया।
भारतीयतायाः प्रकाशिका
सम्पूर्ण भारतीय
ज्ञान-परम्परा की संवाहिका संस्कृत है। आहार-व्यवहार, वेष-भूषा, कर्तव्याकर्तव्य
आदि का प्रकाशन इसी भाषा मे सन्निहित है।
संस्कृतेः सम्पोषिका
यह वस्तुपरक न होकर अर्थपरक
भाषा है। जैसे भारतीय कालविभाजन युगपरक है सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और
कलियुग। प्रत्येक युग का अपना स्वरूप है जो वर्तमान को क्या होना है इसके लिये
प्रयत्नशील रहने का उत्साह भरता है। ईश्वीय वर्ष ऐसा कोई स्वरूप नहीं बताता है।
वैचारिकोन्नतेः साधनम्
वैचारिकोन्नति का अर्थ है
समस्त प्राणियों के प्रति आदर-भाव का होना। यह विचार इस भाषा से स्फुट रूप मे आता
है। पशु-पक्षि-वन-पर्वतों को देवता का स्वरूप इसी भाषा की देन है। जिससे
उनके प्रति संरक्षण और आदर-भाव स्वतः स्फुरित होता है।
मातृवत् वात्सल्यम्
माता जैसे अपने सन्तति के
हमेशा अबोध मानते हुए वात्सल्य प्रदर्शित करती है ठीक उसी प्रकार संस्कृत भी अपने
अध्येताओं को अत्यधिक चिन्तनशील, विवेचन के लिए प्रयासरत रहने का अवसर प्रदान करती
है। यही कारण है कि कम से कम दसहजार वर्षों से यह विपुल साहित्य के रूप मे वर्तमान
है।
बन्धुवत् सहाय्यतत्परा
प्रत्येक समस्या मे जिसप्रकार
बन्धु सहायक होता है ठीक वैसे हीं संस्कृत भी प्रत्येक विचिकित्सा मे समुचित उत्तर
के साथ प्रस्तुत हो जाती है। चाहे नये शब्दों का निर्माण हो, संगणक के लिये समुचित
भाषा की आवश्यकता हो या अन्तरिक्ष की कोई बात हो। संस्कृत प्रत्येक स्थान पर
सहायिका है।
भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका
जिसप्रकार भगिनी अपने भ्राता
के समुन्नति और प्रतिष्ठा लिए प्रेमपूर्णभावों के साथ हमेशा तत्पर रहती है उसी प्रकार
संस्कृत भी भौतिक और आध्यात्मिक दोनो समुन्नति का पथ प्रदर्शित करती रहती है।
पितृवत् वैचारिकोन्नतेः
प्रेरिका
यथा पिता अपने पुत्र को एक
अच्छा, विचारवान्, सद्गुणसम्पन्न मनुष्य होना चाहता है उसी प्रकार यह संस्कृत भी
इन्ही गुणों को व्यवस्थित करने मे प्रयासरत दिखती है। जैसे- सत्यं वद। धर्मं
चर। स्वाध्यायान् मा प्रमद। इत्यादि।
मित्रवत् सदसद् ज्ञानं जनयति
सद् और असद् के बीच अन्तर
करने वाली बुद्धि हीं विवेक पद वाच्य है। और यह बुद्धि इसी भाषा के अन्तर्गत
निबद्ध साहित्य के अध्ययन से आती है। जो संसार को वस्तु न मानकर, मनुष्य को संसाधन
न मानकर उसे प्रकृति मानता है।
बहुत अच्छे विचार
ReplyDeleteबहुसुन्दरम् ।
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