8/21/2020

होने की समझ

 

    अस्तित्व होने का अनुभव करना है। यह अनुभव स्वयं होता है और अपने आस-पास को प्रभावित करता है। मानव के सारे उपक्रम जो वह अपने संज्ञानात्मक प्रवृत्तियों का उपयोग करने से प्रारम्भ करता है इसी अस्तित्व के लिये होते हैं। किसी के प्रति सन्देह, किसी के प्रति लगाव, किसी के प्रति ईर्ष्या या फिर किसी के प्रति क्रोध सभी जगह अपने आप को स्थापित करने कि जद्दोजहद है। 

    मेरे बारे मे वह क्या सोचता है? इस प्रश्न का उत्तर भी अपने आप को स्थापित करना ही होता है न कि उस दूसरे के होने मे सहयोग करना।  अपने होने का अनुभव दूसरों को कराना अस्तित्व के समर का प्रमुख ध्येय है। अस्तित्व की यह लड़ाई अनादिकाल से अनवरत विद्यमान है। इसी अस्तित्व की लड़ाई मे सभ्यताओं का विकास हुआ। वैज्ञानिक आविष्कारों का तांता चल पड़ा।

अपने होने का एहसास वैसे तो व्यक्तिनिष्ठ होता है परन्तु अधिकतर समय यह समूह परक भी देखा जाता है। किन्तु यहां यह कहना मिथ्या नहीं होगा कि समूह के प्रारम्भिक अवस्था मे भी एक व्यक्ति ही स्रोत के रूप मे कार्य करता है। अतः समूह-परक अस्तित्व की लड़ाई भी व्यक्ति -निष्ठ ही है। अपनी उपस्थिति स्वयं मे, परिवार मे, समुदाय मे, देश मे तथा विश्व मे बताने के लिये ही तो विविध सम्प्रदायों का तांता लगा हुआ है। सुकृत्य और कुकृत्य अनवरत विद्यमान हैं। इस परम्परा का अवसान कभी नहीं होने वाला है।

       वैसे कहें तो अस्तित्व-संज्ञान के बिना रहना भी  रहना है क्या ?  अस्तित्व के अभाव मे हम हैं भी कुछ नहीं। अस्तित्व की लड़ाई हीं हमे जीने की प्रेरणा देती है। जहां भी यह लड़ाई रुक जाती है हमारा जीवन भी रुक जाता है। इस होने के एहसास मे या तो हम स्वयं जैसा होना पसन्द करते हैं या अपने आदर्श के जैसा। यह आदर्श भी हमारी ही सोच के अनुसार होता है। या फिर कई बार बचपन मे ही हमे यह एहसास करा दिया जाता है कि हमे किस प्रकार का होना है फिर हमारी खोज भी उसी प्रकार के होने की हो जाती है। इन सबके बीच कई बार देखा जाता है कि कुछ लोग अपने आप को ही भूल जाते हैं। उनको पता ही नहीं चलता वे क्या होना चाहते थे और क्या होकर रह गए हैं। वे समझ हीं नहीं पाते कि उनकी अपनी चिन्तन शक्ति, जीवन शैली या फिर उनका अपना होना भी कुछ है। 

इन सब बातों के बीच बात इतनी सी है कि अस्तित्व की समझ का होना आवश्यक है। अस्तित्व के लिये प्रयास करना भी आवश्यक है। यही हमारे जीवन का परं लक्ष्य भी है और मानव के विकास-क्रम की कहानी भी। कई बार इस अस्तित्व के लिये प्रयास करना  कुछ लोगों को अहंकार नजर आता है। आता रहे। पर अहंकार और एहसास के बीच का अन्तर हमे स्वयं रखना है। किसी को प्रसन्न रखने के लिये नहीं। अन्यथा वह प्रसन्न रखने का मिथ्या प्रयास जो कदाचित् ही सफल हो पाये, स्वयं के होने के लिए बाधा ही है। अतः उस अस्तित्व की समझ स्वयं से निःसृत होनी चाहिये न की किसी के द्वारा जबरन थोपी गई।

आप यह पढ़ रहे हैं इसमें भी लेखक के अस्तित्व की लालसा निहित है।

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