9/04/2020

शिक्षक

💐सबको शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।💐


शिक्षक एक ऐसा अभिधान है जो हम सभी के जीवन में अपना अमूल्य स्थान रखता है। वैसे तो हम रोज कुछ ना कुछ किसी ना किसी के द्वारा अपने दैनंदिन कार्यों में सीखते ही हैं पर शिक्षक जो विद्यालय में हमें सिखाते हैं वह एक अद्भुत प्राप्तव्य है। इसी कारण तो हर कोई उस शिक्षक के पद को प्राप्त नहीं कर पाता है चाहे हम उससे कितना भी सीख ले।

जब हम कभी संशयात्मक परिस्थिति में होते हैं अपने उस मनपसंद शिक्षक की बातों को याद करते हैं और हमारा संदेह तत्काल ही उड़न छू हो जाता है। हम अपने आप को एक सही दिशा में और सही स्थान पर पाते हैं।

कई बार तो हमें याद आता है कि हमारे सबसे क्रोधित होने वाले शिक्षक ने हमें अपने कर्तव्य बोध के प्रति सदा सचेस्ट किया और आज हम जिस भी परिस्थिति में हैं उन्हीं शिक्षक के उस डांट का प्रतिफल है और कई बार हमें सौम्य व्यवहार वाले शिक्षक की याद आती है जिन्होंने अपने साधारण से व्यवहार से हमें और साधारण होने के लिए प्रेरित किया।

वैसे तो वर्तमान में शिक्षा को व्यवसाय और शिक्षक को व्यवसाय का संचालक माना जा रहा है। पर यह इससे कहीं बहुत अधिक है। यह किसी दुकान पर बैठने वाले दुकानदार अथवा उस दुकानदार की मदद करने वाले सहायक और ग्राहकों के समान नहीं है। इसका सीधा संबंध भावना से है। इस भावनात्मक संपर्क के बगैर शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच कुछ पंक्तियों को रटाने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। पर यदि यह भावनात्मक संयोग बेहतर है तो जीवन के लिए एक दिशा और जीवन में आने वाली परिस्थितियों के गांठों को खोलने की समझ दोनो ही दोनों को (शिक्षक शिक्षार्थी को) प्राप्त होती है। इसलिए शिक्षक होना इतना आसान भी नहीं है। 

अतः प्रत्येक शिक्षक को अत्यंत सचेतता के साथ अपने जीवन में जीवन्तता तथा बच्चों के साथ साथी की प्रवृत्ति अवश्य ही रखनी पड़ती है। जहां कहीं यह डोर ढीली है पूरी एक पीढ़ी अनावश्यक रूप से मंदता के गर्त में चली जाती है।

आईये, शिक्षक दिवस को एक दूसरे को शुभकामनाएं भी दें और अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहने का संकल्प भी ले।


💐सबको शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं।💐

8/24/2020

ईश्वर

 

मनुष्य की खोज का एक मात्र केन्द्र-बिन्दु।  अपने सभी अनुसन्धानों मे मनुष्य ने, जो है उससे अधिक की खोज मे अपने आप को खपा दिया है। वह अधिक, उस खोजी मनुष्य को मिलता भी है पर तभी कोई दूसरा उससे भी अधिक की खोज कर देता है और वह पूर्व मे किया गया खोज उत्कृष्टतम होते होते रह जाता है। फिर उस नये वाले से उत्कृष्ट क्या है इसकी तलाश शुरू हो जाती है।

ईश्वर परम् आवश्यक तत्त्व है। सामान्यतः इसके बिना इस संसार के किसी भी मनुष्य का कोई कार्य संभव न हो सके। ईश्वर की जरुरत अक्सर संकट काल मे देखी गयी है। परन्तु सामान्य अवस्था मे भी हमे उसकी तलाश रहती है जहां हम अपनी इच्छाओं को जाहिर कर सकें, अपनी आवश्यकताओं को बता सकें, अपनी खुशी व्यक्त कर सकें और सबसे महत्वपूर्ण जिसके अङ्क मे अपने आप को समर्पित कर सकें।  

मुझे लगता है हमारी फितरत है अधीनता की। हम सर्वदा किसी ऐसे उत्कष्ट की खोज मे रहते हैं जो हमारे प्रत्येक क्रिया-कलाप को समझ सके और हमें प्रोत्साहित कर सके। इसीलिए मुझे लगता है कि हम अधीन रहना पसन्द करते हैं।  पर वह अधीनता सर्वशक्तिमान्, सर्वगुणसम्पन्न, सर्वकर्तृत्वशक्ति, सर्वनियन्तृत्वशक्ति और सर्वभोक्तृत्वशक्ति के समक्ष होनी चाहिये। उसी शक्ति को हम आजीवन खोजते रहते हैं। उसी को ईश्वर के रूप मे देखते हैं, और मुख्य बात वही तो सर्वकर्तृत्वशक्तिसम्पन्न, सर्वनियन्तृत्वशक्तिसम्पन्न और सर्वभोक्तृत्वशक्तिसमपन्न ईश्वर है। अन्यथा साधारण और कुछ विशेष के अलावा मनुष्य के अतिरिक्त कोई कुछ नहीं है। उसी ईश्वर को वेदादि शास्त्रों मे, अन्यान्य धर्मग्रन्थों मे नेति नेति कहकर दर्शाया गया है। पूर्व के विद्वान् तो ईश्वर को हीं स्वीकार करते हैं पर पश्चिमी सभ्यता ईश्वर-दूतों को प्रस्तुत करती है। अब आप का निर्णय सर्वोपरि है कि दूत चाहिये या ईश्वर की तलाश मे हैं। 

कुछ लोग कहते हैं कि वे ईश्वर मे विश्वास नहीं करते हैं। पर यह भी सत्य है कि अपने से उत्कृष्टतर किसी न किसी को मानते जरुर हैं। तो भाई मैं कहता हूं अगर उत्कृष्टतर मानना ही है तो उस को क्यों न माना जाए जिसका कोई उत्कृष्टतर नहीं है जो स्वयं उत्कृष्टतम है। अन्यथा चपरासी और मालिक के बीच फंसे रहिये। जीवन तो चल हीं रहा है। पर मुझे पक्का विश्वास है कि आपको अपने उत्कृष्टतर की तलाश है। यह तलाश तब भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।  


8/21/2020

होने की समझ

 

    अस्तित्व होने का अनुभव करना है। यह अनुभव स्वयं होता है और अपने आस-पास को प्रभावित करता है। मानव के सारे उपक्रम जो वह अपने संज्ञानात्मक प्रवृत्तियों का उपयोग करने से प्रारम्भ करता है इसी अस्तित्व के लिये होते हैं। किसी के प्रति सन्देह, किसी के प्रति लगाव, किसी के प्रति ईर्ष्या या फिर किसी के प्रति क्रोध सभी जगह अपने आप को स्थापित करने कि जद्दोजहद है। 

    मेरे बारे मे वह क्या सोचता है? इस प्रश्न का उत्तर भी अपने आप को स्थापित करना ही होता है न कि उस दूसरे के होने मे सहयोग करना।  अपने होने का अनुभव दूसरों को कराना अस्तित्व के समर का प्रमुख ध्येय है। अस्तित्व की यह लड़ाई अनादिकाल से अनवरत विद्यमान है। इसी अस्तित्व की लड़ाई मे सभ्यताओं का विकास हुआ। वैज्ञानिक आविष्कारों का तांता चल पड़ा।

अपने होने का एहसास वैसे तो व्यक्तिनिष्ठ होता है परन्तु अधिकतर समय यह समूह परक भी देखा जाता है। किन्तु यहां यह कहना मिथ्या नहीं होगा कि समूह के प्रारम्भिक अवस्था मे भी एक व्यक्ति ही स्रोत के रूप मे कार्य करता है। अतः समूह-परक अस्तित्व की लड़ाई भी व्यक्ति -निष्ठ ही है। अपनी उपस्थिति स्वयं मे, परिवार मे, समुदाय मे, देश मे तथा विश्व मे बताने के लिये ही तो विविध सम्प्रदायों का तांता लगा हुआ है। सुकृत्य और कुकृत्य अनवरत विद्यमान हैं। इस परम्परा का अवसान कभी नहीं होने वाला है।

       वैसे कहें तो अस्तित्व-संज्ञान के बिना रहना भी  रहना है क्या ?  अस्तित्व के अभाव मे हम हैं भी कुछ नहीं। अस्तित्व की लड़ाई हीं हमे जीने की प्रेरणा देती है। जहां भी यह लड़ाई रुक जाती है हमारा जीवन भी रुक जाता है। इस होने के एहसास मे या तो हम स्वयं जैसा होना पसन्द करते हैं या अपने आदर्श के जैसा। यह आदर्श भी हमारी ही सोच के अनुसार होता है। या फिर कई बार बचपन मे ही हमे यह एहसास करा दिया जाता है कि हमे किस प्रकार का होना है फिर हमारी खोज भी उसी प्रकार के होने की हो जाती है। इन सबके बीच कई बार देखा जाता है कि कुछ लोग अपने आप को ही भूल जाते हैं। उनको पता ही नहीं चलता वे क्या होना चाहते थे और क्या होकर रह गए हैं। वे समझ हीं नहीं पाते कि उनकी अपनी चिन्तन शक्ति, जीवन शैली या फिर उनका अपना होना भी कुछ है। 

इन सब बातों के बीच बात इतनी सी है कि अस्तित्व की समझ का होना आवश्यक है। अस्तित्व के लिये प्रयास करना भी आवश्यक है। यही हमारे जीवन का परं लक्ष्य भी है और मानव के विकास-क्रम की कहानी भी। कई बार इस अस्तित्व के लिये प्रयास करना  कुछ लोगों को अहंकार नजर आता है। आता रहे। पर अहंकार और एहसास के बीच का अन्तर हमे स्वयं रखना है। किसी को प्रसन्न रखने के लिये नहीं। अन्यथा वह प्रसन्न रखने का मिथ्या प्रयास जो कदाचित् ही सफल हो पाये, स्वयं के होने के लिए बाधा ही है। अतः उस अस्तित्व की समझ स्वयं से निःसृत होनी चाहिये न की किसी के द्वारा जबरन थोपी गई।

आप यह पढ़ रहे हैं इसमें भी लेखक के अस्तित्व की लालसा निहित है।

8/20/2020

आदत

 

    आदतें भी कमाल होती हैं। जैसे- बात करने की आदत, चुप रहने की आदत, पढ़ने की आदत, जिम जाने की आदत, देवालय जाने की आदत या फिर किसी व्यक्ति या वस्तु की आदत। आदमी क्या है आदतों का पिटारा है। बाल्यकाल मे जो आदत हम अपना लेते हैं वह हमारे साथ नित्यकर्म के रूप मे जुड़ जाती है। उसके निर्वाह के लिये हमें कोई तैयारी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पर वही जब हम बड़े हो जाते हैं किसी नई आदत को बनाने मे कठिनाईयों का अम्बार लग जाता है। पर हमारा दृढ़निश्चय उस कार्य को आदत बना देता है। 

    हमारी कई आदतों का बदलाव हमारे सहधर्मियों या सहवासियों के संसर्ग के कारण भी बन जाता है और हमे पता हीं नहीं चलता है। कब हम अपने क्रिया-कलाप से स्वयं को पृथक् कर लेते हैं और अपने साथी जैसै बन जाते हैं हमें ज्ञात हीं नहीं होता है। अनेकशः हमारा साथी भी कब हमारी आदतों का शिकार हो जाता है हमे हीं नहीं पता चलता है। अतः हमे हमेशा अपनी आदतों के प्रति सचेत रहना चाहिये। यदि हम सचेत हैं तो सब ठीक है। अन्यथा हम कब अपने आप को खो देंगें हमे पता हीं नहीं चलेगा। अतः हमे निर्णय स्वयं करना चाहिये कि हम किस ओर जा रहे हैं? अपने आप को खो रहे हैं या अपने आप को एक नये अनुभव के लिये तैयार कर रहे हैं।

       पढ़ने की आदत, लिखने की आदत, हंसने की आदत, उछलने कूदने की आदत, अपने सपनों को देखने की आदत, मदद करने की आदत, घूमने-फिरने की आदत कुछ ऐसी आदतें हैं जो अनुभव के साथ अपने आस-पास के वातावरण मे सकारात्मकता का सर्जन करती हैं। कुछ आदतें स्वयं के लिए तो शुरूआती दौर मे आनन्द देती हैं पर कालान्तर मे अवसाद का कारण बन जाती हैं। आदतों का पिटारा इतना जटिल होता है कि हम इससे अपने आप को अलग कर हीं नहीं पाते हैं। अगर वे आदतें हमारी मौलिक हों तो सर्वोत्तम है। अन्यथा हर कोई दूसरों की आदतों को कब अपना मान बैठा है उसे स्वयं हीं नहीं पता है। 

8/17/2020

राजा भोज

 

परमारवंश और राजाभोज

भारतवर्ष अनेक क्षत्रिय राजाओं के इतिहास से अलङ्कृत है। इन सभी राजाओं के मध्य परमारवंशीय क्षत्रिय राजा अपना विशेष स्थान रखते हैं। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार इस वंश के प्रमुख या प्रथमपुरुष अर्बुदाचल पर वशिष्ठ के अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए थे। इन राजाओं ने मालव देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। इन राजाओं मे कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उपेन्द्र  नामक राजा ने नवमशताब्दी मे प्रसिद्धि प्राप्त किया। इनके वंश की परम्परा इन्हीं राजा के साथ हमारे सामने प्राप्त होती है।

मालवाधीशों की वंशपरम्परा

1. उपेन्द्र    (800-825)

2. वैरीसिंह (825-50)

3. सीयक   (850-875)

4. वाक्पति (875-914)

5. वैरीसिंह (वज्रट नाम से प्रसिद्ध)  (914-941)

6. सीयक (हर्षदेव नाम से प्रसिद्ध)  (941-976)

7. वाक्पति (मुञ्ज नाम से प्रसिद्ध)    (976-997)

8. सिन्धुराज (997-1010)

9. भोजराज  (1010-1055)

इस वंशपरम्परा में विद्वानों की एक प्रसिद्ध परम्परा है। भोजराज के चाचा राजा मुञ्ज सरस्वती  के अद्भुत उपासक थे। इनके बारे मे प्रबन्धचिन्तामणि मे एक श्लोक आया है जिसमे कहा गया है कि मुञ्ज के स्वर्गवासी हो जाने से सरस्वती  निरालम्बा हो गयी। गते मुञ्जे यशःपुञ्जे निरालम्बा सरस्वती।

भोजराज अपने समय मे एक जाज्वल्यमान नक्षत्र के समान थे। आप बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न, गुणसम्पन्न लोगों के आदर करने वाले और विद्वद्जनों के द्वारा सम्मानित रहते थे। इन्होंने कई युद्ध भी लडा था। इनके द्वारा लडे गये युद्ध मे चालुक्यराज जयसिंह के साथ युद्ध, चेदिराज गङ्गदेव के साथ युद्ध, आदिनगर राज इन्द्नदेव के साथ युद्ध और लाटराज वत्सराज के साथ लडे गये युद्ध प्रसिद्ध हैं। धारा और उज्जयिनी मे इन्होने एक सौ चार भवनों का निर्माण कराया था। पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि बल्लालसेन ने अपने भोजप्रबन्ध में राजा भोज के दान की महिमा के अद्भुत वर्णन किया है। उन्होने लिखा है कि राजा भोज के दरबार मे जब कोई कवि सुन्दर और प्रशंसनीय काव्य सुनाता था तो राजा उसे लक्ष स्वर्णमुद्रा प्रदान करते थे।

       प्रबन्धचिन्तामणि के अनुसार राजाभोज ने एक सौ चार प्रबन्ध, इतने हीं भवन और इतने हीं विरूद का निर्माण किया था। डॉ. टी. आफ्रैक्ट पण्डित के द्वारा निर्मित पुस्तकसूचीग्रन्थ (Cataloge Catalogoram) मे राजाभोज के द्वारा विरचित बाईस पुस्तकों का वर्णन किया है। डॉ. भगवती लाल राज पुरोहित ने राजाभोज का रचना विश्व नामक अपनी पुस्तक में राजाभोज के लिखे गए साठ पुस्तकों का वर्णन किया है। चन्द्रप्रभसूरी के द्वारा विरचित प्रभावकचरित में भोज के द्वारा लिखे गए पचहत्तर से अस्सी पुस्तकों का वर्णन है। उनके द्वारा लिखे गए पुस्तकों की सूची प्रकाशित और अप्रकाशित दोनो के वर्णन इस प्रकार हैं-

1.  साहित्शास्त्र

1. सरस्वतीकणठाभरण (प्र.)

2. शृङ्गारप्रकाश(प्र.)

2. काव्य

3. चम्पूरामायण (प्र.)

4. शृङ्गारमञ्जरी (प्र.)

5. अवनिकूर्मशतक (प्र.)

6. विद्याविनोद (प्र.)

7. सुभाषितप्रबन्ध (प्र.)

8. शालिकथा (अप्रकाशित)

9. महाकालीविजय (अप्रकाशित)

10. वाग्देवीस्तुति (प्र.)

3.  व्याकरण

11. सरस्वतीकण्ठाभरण (प्र.)

12. प्राकृतव्याकरण (प्र.)

4. कोष

13. नाममालिका भोजनिघण्टु (प्र.)

14. अनेकार्थकोष

15. अमरव्याख्या

5.  संगीत

16. गीतप्रकाश (अप्रकाशित)

6. इतिहास

17. सञ्जीवनी (प्र.)

7. दर्शनशास्त्र

18. तत्तवप्रकाश (प्र.)

19. सिद्धान्तसङ्ग्रह (अप्रकाशित)

20. सिद्धान्तसारपद्धति (अप्रकाशित)

21. राजार्तण्डयोगसूत्रवृत्ति (प्र.)

22. राजमार्तण्ड (वेदान्त) (अप्रकाशित)

23. शिवतत्वरत्नकलिका (अप्रकाशित)

24. तत्त्वचन्द्रिका (अप्रकाशित)

25. क्रमकमलम् (अनुपलब्ध)

8.  ज्योतिष

26. राजमार्तण्ड (प्रकाशित)

27. राजमृगाङ्क (प्रकाशित)

28. विद्वज्जनवल्लभप्रश्नज्ञान (प्रकाशित)

29. प्रश्नकेरली (अप्रकाशित)

30. आदित्यप्रतापसिद्धान्त (अनुपलब्ध)

31. भुजगबलनिबन्ध (अप्रकाशित)

32. ज्योतिः सागरः (अप्रकाशित)

33. रत्नकोष (अनुपलब्ध)

34. ग्रहभाष्यम् (अप्रकाशित)

35. भोजसामुद्रिकम् (अनुपलब्ध)

36. रमलामृतम् (अनुपलब्ध)

9. धर्मशास्त्र

37. पूर्तमार्तण्ड (अनुपलब्ध)

38. व्यवहारसमुच्चय (अनुलब्ध)

39. सिद्धान्तसारपद्धति (अनु.)

40. व्यवहारमञ्जरी (अनु.)

41. विविधविद्याविचारचतुरा (अनु.)

42. राजमार्तण्ड (अनु.)

43. बृहद्राजमार्तण्ड (अनु.)

44. रत्नमाला/रत्नरत्नावली (अनु.)

45. कामधेनु (अनुपलब्ध)

46. धर्मप्रदीप (अनु.)

47. दुगोत्सवाधिकार (अनु.)

48. प्रयोगपद्धतिरत्नावली (अनु.)

49. मनुस्मृतिभाष्यम् (अनु.)

50. धारेश्वरमिताक्षरा (अनु.)

10.           राजनीतिशास्त्र

51. नीतिनिबन्धनम् (अनु.)

52. चाणक्यराजनीतिशास्त्रम् (प्र.)

53. युक्तिकल्पतरु (प्र.)

11.             आयुर्वेद

54. चारुचर्या (प्र.)

55. राजमृगाङ्क (अप्रकाशित)

56. विश्रान्तविद्याविनोद (अप्रकाशित)

57. आयुर्वेदसर्वस्वम् (अनु.)

58. राजमार्तण्डयोगसारसङ्ग्रह (प्र.)

59. शालिहोत्रम् (प्र.)

12.           स्थापत्य

60. समराङ्गणसूत्रधार (प्र.)

61. वास्तुशास्त्रम् (अप्रकाशित)

13.           सन्देहास्पद कृतियां

62. अनिभवभाष्यम्

63. पञ्चाशिका

64. मेघमाला

65. अयसदावविवृतिः

66. वृत्तिमर्तण्ड

67. सिद्धान्तसङ्ग्रहविवृतिः

68. द्रव्यानुयोगतर्कणा

69. न्यायवार्तिकम्

70. खड्गशतकम् (प्र.)

71. अज्ञातनामा प्राकृतकाव्यम् (प्र.)

72. मीमांसा


8/09/2020

खुशियों का मूर्त रूप

संलग्न हूं ,

अपने दैनंदिन में ,

बरसों से बनी हुई

आदतों को सहेजने में ,

समय-समय पर सहेजे गए

क्रियाकलापों को पूरा करने में, 

संलग्न हूं ।



अनवरत , 

अबाध,

मुस्कुराहटों को सामने खड़ा करने में,

संलग्न हूं

कभी इसकी कभी उसकी,

खुशियों को मूर्त रूप देने में ।



 संलग्न हूं ,

 अनवरत,

अबाध ,

स्वकर्म से,

खुशियों को 

साकार बनाने के लिए ,

अपने आप को भुला कर ,

जैसे पता ही नहीं है कि ,

मैं खुद हूं ,

या ,

मैं कोई और।


8/02/2020

#संस्कृतदिवस

#संस्कृतदिवसस्य हार्दिक्यः शुभकामनाः

संस्कृतं न केवला भाषा अपितु भारतीयतायाः प्रकाशिका संस्कृतेश्च संपोषिका अपि वर्तते। एषा वैचारिकोन्नतेः साधनमपि अस्ति। मातृवत् वात्सल्यं प्रदर्शयति। बन्धुवत् सहाय्यतत्परा भवति। भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका अस्ति। पितृवत् वैचारिकोन्नतिशिखरे स्वात्मजान् द्रष्टुं ययते। मित्रवत् विवेकं जनयति। तस्मात् सर्वैः एषा अवश्यम् आश्रयणीया।

भारतीयतायाः प्रकाशिका

सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान-परम्परा की संवाहिका संस्कृत है। आहार-व्यवहार, वेष-भूषा, कर्तव्याकर्तव्य आदि का प्रकाशन इसी भाषा मे सन्निहित है।

संस्कृतेः सम्पोषिका

यह वस्तुपरक न होकर अर्थपरक भाषा है। जैसे भारतीय कालविभाजन युगपरक है सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। प्रत्येक युग का अपना स्वरूप है जो वर्तमान को क्या होना है इसके लिये प्रयत्नशील रहने का उत्साह भरता है। ईश्वीय वर्ष ऐसा कोई स्वरूप नहीं बताता है।

वैचारिकोन्नतेः साधनम्

वैचारिकोन्नति का अर्थ है समस्त प्राणियों के प्रति आदर-भाव का होना। यह विचार इस भाषा से स्फुट रूप मे आता है। पशु-पक्षि-वन-पर्वतों को देवता का स्वरूप इसी भाषा की देन है। जिससे उनके प्रति संरक्षण और आदर-भाव स्वतः स्फुरित होता है।

मातृवत् वात्सल्यम्

माता जैसे अपने सन्तति के हमेशा अबोध मानते हुए वात्सल्य प्रदर्शित करती है ठीक उसी प्रकार संस्कृत भी अपने अध्येताओं को अत्यधिक चिन्तनशील, विवेचन के लिए प्रयासरत रहने का अवसर प्रदान करती है। यही कारण है कि कम से कम दसहजार वर्षों से यह विपुल साहित्य के रूप मे वर्तमान है।

बन्धुवत् सहाय्यतत्परा

प्रत्येक समस्या मे जिसप्रकार बन्धु सहायक होता है ठीक वैसे हीं संस्कृत भी प्रत्येक विचिकित्सा मे समुचित उत्तर के साथ प्रस्तुत हो जाती है। चाहे नये शब्दों का निर्माण हो, संगणक के लिये समुचित भाषा की आवश्यकता हो या अन्तरिक्ष की कोई बात हो। संस्कृत प्रत्येक स्थान पर सहायिका है।

भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका

जिसप्रकार भगिनी अपने भ्राता के समुन्नति और प्रतिष्ठा लिए प्रेमपूर्णभावों के साथ हमेशा तत्पर रहती है उसी प्रकार संस्कृत भी भौतिक और आध्यात्मिक दोनो समुन्नति का पथ प्रदर्शित करती रहती है।  

पितृवत् वैचारिकोन्नतेः प्रेरिका

यथा पिता अपने पुत्र को एक अच्छा, विचारवान्, सद्गुणसम्पन्न मनुष्य होना चाहता है उसी प्रकार यह संस्कृत भी इन्ही गुणों को व्यवस्थित करने मे प्रयासरत दिखती है। जैसे- सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान् मा प्रमद। इत्यादि।

मित्रवत् सदसद् ज्ञानं जनयति

सद् और असद् के बीच अन्तर करने वाली बुद्धि हीं विवेक पद वाच्य है। और यह बुद्धि इसी भाषा के अन्तर्गत निबद्ध साहित्य के अध्ययन से आती है। जो संसार को वस्तु न मानकर, मनुष्य को संसाधन न मानकर उसे प्रकृति मानता है।


इसप्रकार के अनेकों कारण हैं जिससे इस भाषा के प्रति सद्भावना रखना आवश्यक है। आईये मिलकर आज संस्कृत-दिवस पर संस्कृत से उपकृत होने के लिए इसका आश्रय करें।

शिक्षक

💐सबको शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।💐 शिक्षक एक ऐसा अभिधान है जो हम सभी के जीवन में अपना अमूल्य स्थान रखता है। वैसे तो हम रोज कुछ ना क...