8/20/2020

आदत

 

    आदतें भी कमाल होती हैं। जैसे- बात करने की आदत, चुप रहने की आदत, पढ़ने की आदत, जिम जाने की आदत, देवालय जाने की आदत या फिर किसी व्यक्ति या वस्तु की आदत। आदमी क्या है आदतों का पिटारा है। बाल्यकाल मे जो आदत हम अपना लेते हैं वह हमारे साथ नित्यकर्म के रूप मे जुड़ जाती है। उसके निर्वाह के लिये हमें कोई तैयारी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पर वही जब हम बड़े हो जाते हैं किसी नई आदत को बनाने मे कठिनाईयों का अम्बार लग जाता है। पर हमारा दृढ़निश्चय उस कार्य को आदत बना देता है। 

    हमारी कई आदतों का बदलाव हमारे सहधर्मियों या सहवासियों के संसर्ग के कारण भी बन जाता है और हमे पता हीं नहीं चलता है। कब हम अपने क्रिया-कलाप से स्वयं को पृथक् कर लेते हैं और अपने साथी जैसै बन जाते हैं हमें ज्ञात हीं नहीं होता है। अनेकशः हमारा साथी भी कब हमारी आदतों का शिकार हो जाता है हमे हीं नहीं पता चलता है। अतः हमे हमेशा अपनी आदतों के प्रति सचेत रहना चाहिये। यदि हम सचेत हैं तो सब ठीक है। अन्यथा हम कब अपने आप को खो देंगें हमे पता हीं नहीं चलेगा। अतः हमे निर्णय स्वयं करना चाहिये कि हम किस ओर जा रहे हैं? अपने आप को खो रहे हैं या अपने आप को एक नये अनुभव के लिये तैयार कर रहे हैं।

       पढ़ने की आदत, लिखने की आदत, हंसने की आदत, उछलने कूदने की आदत, अपने सपनों को देखने की आदत, मदद करने की आदत, घूमने-फिरने की आदत कुछ ऐसी आदतें हैं जो अनुभव के साथ अपने आस-पास के वातावरण मे सकारात्मकता का सर्जन करती हैं। कुछ आदतें स्वयं के लिए तो शुरूआती दौर मे आनन्द देती हैं पर कालान्तर मे अवसाद का कारण बन जाती हैं। आदतों का पिटारा इतना जटिल होता है कि हम इससे अपने आप को अलग कर हीं नहीं पाते हैं। अगर वे आदतें हमारी मौलिक हों तो सर्वोत्तम है। अन्यथा हर कोई दूसरों की आदतों को कब अपना मान बैठा है उसे स्वयं हीं नहीं पता है। 

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