अद्वैत
कीट पतङ्ग मे
हस्ति शशक मे
दनुज मनुज मे
जड चेतन मे
जीव जगत मे
दया प्रेम हो ।
भाव कुभाव से मुक्त बने हम
घृणा क्रोध को दूर करे
षण्ड पुरूष मे दर्शन पाएं,
परं देव का रूप निहारें ।
चक्र सुदर्शन प्राण दान दे,
वज्र इन्द्र का अभिमान तजे
सुधा मिले वचनों मे सबके
राजा रंक के विचार मिले।
विश्वास बने परस्पर मे
सम्मान बढे मिले सबको
ईश्वर के इस नश्वर जग मे
ईश्वर रूप दिखे सबमे।
यही अद्वैत स्वीकार मुझे
इसी को अब विस्तार मिले
अवसान मिले द्वैध द्वैत को
सर्वत्र अद्वैत अद्वैत बने।।
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