8/09/2020

खुशियों का मूर्त रूप

संलग्न हूं ,

अपने दैनंदिन में ,

बरसों से बनी हुई

आदतों को सहेजने में ,

समय-समय पर सहेजे गए

क्रियाकलापों को पूरा करने में, 

संलग्न हूं ।



अनवरत , 

अबाध,

मुस्कुराहटों को सामने खड़ा करने में,

संलग्न हूं

कभी इसकी कभी उसकी,

खुशियों को मूर्त रूप देने में ।



 संलग्न हूं ,

 अनवरत,

अबाध ,

स्वकर्म से,

खुशियों को 

साकार बनाने के लिए ,

अपने आप को भुला कर ,

जैसे पता ही नहीं है कि ,

मैं खुद हूं ,

या ,

मैं कोई और।


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