3/22/2019

SWASTIK स्वस्तिक

 स्वस्तिक 

स्वस्तिक भारतीय परम्परा का संवाहक है, प्रस्तोता है और पहचान है। यह उस भारतीय प्रतीकों का धूरि है जो गर्व करने का साहस देता है। यह एक एहसास है प्रत्येक भारतीय का जो कहीं भी रहे कुछ भी करे पर अपने देहली को स्वस्तिक से अवश्य सुशोभित करता है। यह स्वस्तिक उसे उर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करता है। जब संसार चिर अन्धकार मे डूबा हुआ था तब भी भारतीय ज्ञान दर्शन अपने चरम मे प्रदीप्त था और उस प्रदीप्ति का प्रतीक यही चिह्न था। यह बताता था की संसार ऊर्जस्वि है, विकासशील है। प्राकृतिक स्रोतों की भरमार है और हम उनसे उपकृत हैं वे हमारे पूज्य हैं। हम इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने बजाये सम्मान पूर्वक सीमित मात्रा मे उपयोग करें तो हमारे लिये श्रेयस्कर है।

स्वस्तिक शब्द सु+अस्+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना निहित है। 'स्वस्तिक' शब्द की निरुक्ति है - 'स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः' अर्थात् 'कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।

स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं। 


यदि आधुनिक  दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक,  इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के उर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है ओर इस उर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है---"बोविस" । मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। स्वस्तिक में इस उर्जा का स्तर  1,00,0000 बोविस है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। 


इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर,गुरूद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं,कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों,मन्दिरों,पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।



स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे 'स्वस्तिक' कहते हैं। यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे 'वामावर्त स्वस्तिक' कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही 'वामावर्त स्वस्तिक' अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है।मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। 

3/20/2019

HOLI/होली

होली

बाग-बगीचा, लोग-बाग सब,
गये बौराय आई होली।

राग रँग मे सराबोर सब,
लगे गमकने आई होली।

पिचकारी वधू  हाथ धरे,
और बाट निहारे आई होली।

गुलाल हाथ से छलकत जात है,
मन मुस्कात है आई होली।

रँग के साथ है भाँग आज तो,
छूटत हास है आई होली।

3/12/2019

Springtime/ बसंत



बसंत

बसंत,
सुनते हीं,
पुलक गात,
बिगड़ते जज्बात,
मन में उन्माद 
अपनी जगह बना लेते हैं।

बसंत, 
सुनते ही,
मन में सुमन,
बाग मे गुन्जन,
सुन्दरी का वदन,
दृष्टिगत होने लगता है।

बसंत,
सुनते हीं,
रसाल में बौर,
अली का शोर,
पवन मे जोर,
नजर आने लगता है।

बसंत 
सुनते हीं,
पेय मे भंग,
गालों मे रँग,
मन में उमंग,
घहराने लगता है।


#वदन=मुख






3/06/2019

Media and there Responsibilities

तृतीय स्तम्भ और जिम्मेदारियां



लोकतंत्र का सौंदर्य 'अभिव्यक्ति कि स्वतन्त्रता' में ही परिलक्षित होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने चुने गये प्रतिनिधि से प्रश्न करने के लिये अवसर प्राप्त करता है। उसको यह अवसर लोकतंत्र का तृतीय स्तम्भ कही जाने वाली 'पत्रकारिता' प्रदान करती है। यह पत्रकारिता आकाशवाणी, टेलिविज़न, समाचारपत्र, संवाद, साक्षात्कार आदि रूपों मे देखी जाती है। लोकतंत्र मे यदि यह प्रश्न करने का अवसर न हो तो इसको भी राजतंत्र हीं कहा जायेगा। अत: जनप्रतिनिधि को सर्वदा हीं उत्तर देने के लिये सजग रहना चाहिये और पत्रकारिता मे संलग्न व्यक्ति को भी जनसमुदाय के प्रश्नो को यथावत् चर्चा का विषय बनाना चाहिये। यही लोकतंत्र कि आत्मा है और एक पत्रकार का एकमात्र कर्तव्य। 

इस कर्तव्य निर्वहन में एक बात का अवश्य ध्यान होना चाहिये कि यह समस्त प्रक्रिया एक राष्ट्र के उन्नति के लिये है । उसके सतत विकास, जनभागीदारी, लोककल्याण, आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिये है। अत: पत्रकारिता से जीवन निर्वाह कर रहे प्रत्येक व्यक्ति (पत्रकार) को इन बातों का सदैव संस्मरण होना चाहिये। यह तो रही उस राष्ट्र के अन्दरूनी मामलों के लिये पत्रकारिता का दायित्व। आब थोडा अलग सोचते हैं। 


एक देश अपने में सम्पूर्ण रूप से अपनी सभी अवश्यक्ताओं को पूर्ण करने मे असमर्थ होता है। इस कारण उसको दूसरे देशों से व्यापारिक सम्बंध भी बनाने पडते हैं।  यह सम्बंध कई बार अस्मिता कि कसौटी तक भी पहुंच जाता है और फ़िर उसको अपने सम्बंधी देश के साथ शत्रुवत् या मित्रवत् व्यवहार भी करना होता है। यहां पर एक पत्रकार कि जिम्मेदारी कुछ अधिक हीं संवेदन पूर्ण हो जाती है। उसका परं दायित्व होता है कि हर सम्भव अपने देश के सम्मान और प्रगतिशीलता पर आंच न आने दे। अगर किसी भी तरह इस प्रकार का विचार फैलता है जिससे देश के महत्त्व को कम किया जा रहा हो तो वह उस विचार को फैलने से रोके या फ़िर उस विचार का प्रचार हीं बन्द कर दे। जिससे की वाह विचार हीं अपनेआप अस्तंगत हो जाये। यह राष्ट्र के प्रति निष्ठावान् पत्रकार का धर्म और कर्तव्य दोनो है। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ होता है तो उसको आजीविका का अन्य स्रोत खोज लेना चाहिये।

आज भारत मे हमारे पत्रकार यही कर रहे हैं। अगर कोई मत्त(पागल) जनप्रतिनिधि अपने ही देश की अस्मिता पर कीचड़ उछालने को अपना ध्येय बनाता है तो उसकी बातों को अनसुना कर देना हीं श्रेयश्कर है। पर सभी पत्रकार उसी बात को अपना मुख्य समाचार बनाते हैं, उसे चर्चा और परिचर्चा का विषय बना रहे हैं। यह उनके तात्कालिक पेट भरने का कार्य हो  सकता है पर आने वाली पीढ़ी के लिये एक विकृत समाज और गर्हित देश बनाने का भी सर्वोत्तम स्रोत बन रहा है। यह लोकतंत्र  के नाम पार एक अत्यंत अशोभनीय पत्रकारिता है।




3/03/2019

आखिर कौन हैं ?

आखिर हम कौन हैं ?




ज्ञानी, समझदार, जानकार, ज्ञाता यही तो है बुद्ध का मतलब। तो क्या आप और हम बुद्ध नहीं है? क्यूँ नहीं हैं? अभी पडोसी से अनबन हो जाये तो हम अपने आप को उससे अधिक समझदार घोषित कर देते हैं। मित्र को हर समय उपदेश देते हैं। अपने से नीचे ओहदे के कर्मचारी से खुद को क्या हम ज्ञानी नही मानते है? हां भाई पर इससे क्या बुद्ध बुद्ध हैं और हम कुछ नहीं। उसने कहना प्रारम्भ किया -

 बुद्ध पहले सिद्धार्थ थे। उन्होंने संसार को निस्सार समझा। उन्होंने संसार को दु:खात्मक पाया। गृह त्याग कर दिया। कई प्रकार के लोगों से मिले। उपाय का चिंतन किया। अपने चिंतन के आकार को बढ़ाया। पर कुछ लाभ नहीं हुआ। चलते चलते "निरंजना" के तट पर पहुंचे। अपने आप को योग में लीन कर दिया। फिर क्या था ? चमत्कार हुआ। अपूर्व चमत्कार। अकल्पनीय समाधान। सिद्धार्थ "बुद्ध" हो गए। संसार की अनित्यता को समझ गए। उन्होंने कहा "संसार में दु:ख है। दु:ख का कारण समुदय है अर्थात् सांसारिक पदार्थों के प्रति तृष्णा।   दु:ख निवारण का उपाय भी है। निवारण का मार्ग अष्टांगिक है।" इसी को आर्य सत्य कहा जाता है। 

उन्होंने जीव दया के प्रति उदारता का उपदेश दिया। अहिंसा का अनुगमन किया। बुद्ध इस ज्ञान को पाकर प्रफुल्लित हुए की नहीं पर यह अवश्य हुआ की उन्होंने इसका उपदेश सबको दिया। और फिर कभी सांसारिक नहीं हुए।


एक हम हैं जो उनके इन विचारों को जानते हैं समझते हैं फिर भी दु:ख सागर की लहरों में गोते लगा रहे हैं । तृष्णा हमारी प्रमुख सहधर्मिणी बन गई है। अगर क्रियात्मक नहीं तो वैचारिक रूप से हिंसात्मक है हीं हम। तो आप हीं निर्णय दीजिए हम क्या है ?

3/01/2019

Soldier

हिन्द का सैनिक

दहाड़ मार जो विपक्षवक्ष को विदार दे,
सपत्न सैन्य गुच्छ को सहर्ष हीं उजाड़ दे,
सगर्व जो रहे सदा, स्वराष्ट्र भक्ति से भरा,
दिगन्त कीर्तिकेतु हिन्द वीर की रहे सदा।।



#सपत्न =शत्रु



2/28/2019

Soldiers

सिपाही



दहाड मार शत्रु के वराङ्ग जो उखाड़ता,
बलिष्ठ सैन्य देश का सुदिव्य शक्ति धारता।
समस्त जाल काट, अंतरिक्ष को त्रिवर्ण से 
सजा रहा, सदा उसे प्रणाम कोटि कोटि है।

#छन्द= पञ्चचामर 
#वराङ्ग= मस्तक

2/26/2019

आत्म गौरव

आत्म गौरव


हो सरलतम् मार्ग, यह कभी सोचा नहीं,
दुर्गमों की बादशाहत हमने कभी छोडी कहाँ।
तुम अनीति को चुनोगे, अब ही नहीं जब भी कहीं,
काल बनकर टूटते, हमको पाओगे वहीं।।

2/25/2019

कलम

कलम

संस्कृत के एक कोश के अनुसार "वह प्रसिद्ध वस्तु जिससे लिपि का विन्यास किया जाये" कलम कही जाती है। यह कलम सबके लिये अत्यंत मूल्यवान, आवश्यक और अनिवार्य वस्तु है। मुझे ऐसा अनुभव होता है कि  इससे अक्सर भाग्य लिखा जाता है। जब कभी कोई असफल महसूस करता है तो कहता है भगवान ने मेरे भाग्य मे लिखा ही नहीं है। यहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कहते है मैने कितनों भाग्य लिखा है, और कुछ तो यहां तक कहते हैं मैने अपना भाग्य स्वयं लिखा है।


            इस कलम की महिमा तो देखिये इससे स्लेट पर, दीवाल पर, होर्डिग पर लिखने का मतलब है जब मन किया मिटा दो। पर भाग्य में लिखा नहीं मिटा सकते।


              कुछ लोग तो ऐसा लिखते हैं की उनको 'कलम का जादूगर' या 'कलम का सिपाही' कहा जाता है। उनकी लिखावट को लोग धरोहर मानते हैं। अच्छा मजे की बात तो देखिये की लिपि के ज्ञान के बावजूद लिखने के लिये उपयुक्त कुछ ही लोग माने जाते है। कानून की बातें वकील, समाचार को पत्रकार,  आवेदन को अभ्यर्थी, कथा कहानी  कविता को रचनाकार, गीत को गीतकार, पाठ्यपुस्तक को शिक्षाविद् लिखते हैं। वैसे यह सूची कुछ लम्बी है इस लिये विस्तार न करते हुये विषय पर आते हैं।


               कुछ लोगों के कलम मे बड़ी ताकत होती है वे प्रसन्न होकर जिसका नाम लिख दें उसी की नौकरी पक्की और यदि रुष्ट हो जायें तो नैकरी समाप्त। इस कलम से आशिक जब हृदय रुपी उदधि मे उठती हुयी लहरों की बात लिखता है तो प्रेमी तो क्या अपरिचित मानव भी उसको अपनी ही बात मनाने लग जाता है। स्नेह सागर का पानीय निर्बंध हो आंखों से बाहर आ जाता है। कलम से जब कालिदास "अज का क्रन्दन" लिखते हैं तो हिन्दी का कवि पूछ बैठता है " कालिदास सच सच बतलाना आज रोया या तुम रोये थे"।


             साथियों यह कलम सच मे अद्भुत है । लिखना शुरु करें तो रुकने का नाम नहीं लेती है।

2/23/2019

रास्ता


रास्ता



निरपेक्ष भाव से सबका स्वागत है यहां ।जाने के लिए आओ, ठहरने के लिए आओ, देखने को आओ, नापने के लिए आओ, पाने के लिये आओ या खोने के लिए आप सब का स्वागत है । पाने के लिये बच्चन साहब कहते हैं "राह पकड़ तू एक चला चल पा जायेगा मधुशाला "। अर्थात् मेरा अनुकरण करो और प्राप्तव्य हाजिर है कदमों मे। यह मत सोचो चलना कहाँ से है । तू जहाँ है वहीं से चलना प्रारम्भ करो तो सही।


यदि खोना चाहते हो तो भी मेरा अनुकरण करो।आओ और मेरे मे उलझ जाओ। किंकर्तव्य विमूढ हो जाओ। निर्णय विहीन हो जाओगे, समझ ही नही पाओगे सही यही है या कोई और। जिससे पूछोगे वह भी तुम्हारी ही तरह उलझा मिलेगा। पर वह तुमसे पहले से उलझा मिलेगा। दुसरा तीसरा सब उलझे मिलेंगें।

देखने के लिये आओगे तो कभी नीरवता पाओगे कभी कोलाहल, कभी उत्सव पाओगे कभी शोक ही नसीब होगा। पर खूबसूरती मे खो जाओगे कभी उदास हो जाओगे।
ठहरना चाहोगे तो साम्राज्य के अधिपति भी हो सकते हो या रंक के रिस्तेदार।

जी हाँ श्रीमान् मैं रास्ता हूँ । मै स्वभाव से भी रास्ता हीं हूं। संस्कृत मे मुझे परिभाषित करते हुये आचार्य कहते हैं "महाजनो येन गत: स पन्था:"। अर्थात् महान लोग जो आचरण करते हैं उसे हीं पथ कहा गया है। पर हिन्दी के कवि कहते हैं "लीक छोड़ तीनो चले शायर सिंह सपूत"।

श्रीमान् जी निर्णय आपका है आप मुझे क्या मानते हैं? पर मैं हूँ तो रास्ता हीं।


पिता

पिता


पिता
ढाल है,
दीवार है,
पतवार है।

पिता
आशावादी है,
चिन्तक है,
ज्योतिषी है।

पिता
खुशी बांटता है,
दुःख रोकता है,
आनन्ददाता है।

पिता
धूप ओढता है,
बरसात में नहाता है,
बेचैनी में सोता है।

पिता
खुश होता है,
सुतानन लख कर,
जिद पूरी कर,
खुद का मनमसोस कर।

पिता
ब्रह्मा है,
कुम्हार है,
मूर्तिकार है।


पिता की बात मान लेने वाला,
आत्मज,
सुख पाता है,
यश फैलाता है,
प्रशंसा बटोरता है।

पिता
हित चाहता है,
हित करता है।

पिता
न पुराना होता है,
न पुरानी सोच का होता है।
यह हमारी सोच का हिस्सा है,
हम क्या मानते हैं।

पिता तो बस,
पिता होता है।


सैनिक

सैनिक





सैनिक,
अभिधान प्रथित है।



राष्ट्र रक्षण तत्पर मै,
शीत ताप में भेद न जानूं,
प्रेम हृदय में धारूं मैं।

शत्रु शमन,
मानवता रक्षण,
और परिजन पोषण जानूं मै।


वेश अलौकिक तनिक न मेरी,
फिर भी भय में रहते सब,
पुत्र अंक में लोटे मेरे,
निश्छल हूं यह जानूं मै।

सैनिक,
यह अभिधान प्रथित है।




शिक्षक

💐सबको शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।💐 शिक्षक एक ऐसा अभिधान है जो हम सभी के जीवन में अपना अमूल्य स्थान रखता है। वैसे तो हम रोज कुछ ना क...