3/06/2019

Media and there Responsibilities

तृतीय स्तम्भ और जिम्मेदारियां



लोकतंत्र का सौंदर्य 'अभिव्यक्ति कि स्वतन्त्रता' में ही परिलक्षित होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने चुने गये प्रतिनिधि से प्रश्न करने के लिये अवसर प्राप्त करता है। उसको यह अवसर लोकतंत्र का तृतीय स्तम्भ कही जाने वाली 'पत्रकारिता' प्रदान करती है। यह पत्रकारिता आकाशवाणी, टेलिविज़न, समाचारपत्र, संवाद, साक्षात्कार आदि रूपों मे देखी जाती है। लोकतंत्र मे यदि यह प्रश्न करने का अवसर न हो तो इसको भी राजतंत्र हीं कहा जायेगा। अत: जनप्रतिनिधि को सर्वदा हीं उत्तर देने के लिये सजग रहना चाहिये और पत्रकारिता मे संलग्न व्यक्ति को भी जनसमुदाय के प्रश्नो को यथावत् चर्चा का विषय बनाना चाहिये। यही लोकतंत्र कि आत्मा है और एक पत्रकार का एकमात्र कर्तव्य। 

इस कर्तव्य निर्वहन में एक बात का अवश्य ध्यान होना चाहिये कि यह समस्त प्रक्रिया एक राष्ट्र के उन्नति के लिये है । उसके सतत विकास, जनभागीदारी, लोककल्याण, आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराने के लिये है। अत: पत्रकारिता से जीवन निर्वाह कर रहे प्रत्येक व्यक्ति (पत्रकार) को इन बातों का सदैव संस्मरण होना चाहिये। यह तो रही उस राष्ट्र के अन्दरूनी मामलों के लिये पत्रकारिता का दायित्व। आब थोडा अलग सोचते हैं। 


एक देश अपने में सम्पूर्ण रूप से अपनी सभी अवश्यक्ताओं को पूर्ण करने मे असमर्थ होता है। इस कारण उसको दूसरे देशों से व्यापारिक सम्बंध भी बनाने पडते हैं।  यह सम्बंध कई बार अस्मिता कि कसौटी तक भी पहुंच जाता है और फ़िर उसको अपने सम्बंधी देश के साथ शत्रुवत् या मित्रवत् व्यवहार भी करना होता है। यहां पर एक पत्रकार कि जिम्मेदारी कुछ अधिक हीं संवेदन पूर्ण हो जाती है। उसका परं दायित्व होता है कि हर सम्भव अपने देश के सम्मान और प्रगतिशीलता पर आंच न आने दे। अगर किसी भी तरह इस प्रकार का विचार फैलता है जिससे देश के महत्त्व को कम किया जा रहा हो तो वह उस विचार को फैलने से रोके या फ़िर उस विचार का प्रचार हीं बन्द कर दे। जिससे की वाह विचार हीं अपनेआप अस्तंगत हो जाये। यह राष्ट्र के प्रति निष्ठावान् पत्रकार का धर्म और कर्तव्य दोनो है। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ होता है तो उसको आजीविका का अन्य स्रोत खोज लेना चाहिये।

आज भारत मे हमारे पत्रकार यही कर रहे हैं। अगर कोई मत्त(पागल) जनप्रतिनिधि अपने ही देश की अस्मिता पर कीचड़ उछालने को अपना ध्येय बनाता है तो उसकी बातों को अनसुना कर देना हीं श्रेयश्कर है। पर सभी पत्रकार उसी बात को अपना मुख्य समाचार बनाते हैं, उसे चर्चा और परिचर्चा का विषय बना रहे हैं। यह उनके तात्कालिक पेट भरने का कार्य हो  सकता है पर आने वाली पीढ़ी के लिये एक विकृत समाज और गर्हित देश बनाने का भी सर्वोत्तम स्रोत बन रहा है। यह लोकतंत्र  के नाम पार एक अत्यंत अशोभनीय पत्रकारिता है।




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