आखिर हम कौन हैं ?
ज्ञानी, समझदार, जानकार, ज्ञाता यही तो है बुद्ध का मतलब। तो क्या आप और हम बुद्ध नहीं है? क्यूँ नहीं हैं? अभी पडोसी से अनबन हो जाये तो हम अपने आप को उससे अधिक समझदार घोषित कर देते हैं। मित्र को हर समय उपदेश देते हैं। अपने से नीचे ओहदे के कर्मचारी से खुद को क्या हम ज्ञानी नही मानते है? हां भाई पर इससे क्या बुद्ध बुद्ध हैं और हम कुछ नहीं। उसने कहना प्रारम्भ किया -
बुद्ध पहले सिद्धार्थ थे। उन्होंने संसार को निस्सार समझा। उन्होंने संसार को दु:खात्मक पाया। गृह त्याग कर दिया। कई प्रकार के लोगों से मिले। उपाय का चिंतन किया। अपने चिंतन के आकार को बढ़ाया। पर कुछ लाभ नहीं हुआ। चलते चलते "निरंजना" के तट पर पहुंचे। अपने आप को योग में लीन कर दिया। फिर क्या था ? चमत्कार हुआ। अपूर्व चमत्कार। अकल्पनीय समाधान। सिद्धार्थ "बुद्ध" हो गए। संसार की अनित्यता को समझ गए। उन्होंने कहा "संसार में दु:ख है। दु:ख का कारण समुदय है अर्थात् सांसारिक पदार्थों के प्रति तृष्णा। दु:ख निवारण का उपाय भी है। निवारण का मार्ग अष्टांगिक है।" इसी को आर्य सत्य कहा जाता है।
उन्होंने जीव दया के प्रति उदारता का उपदेश दिया। अहिंसा का अनुगमन किया। बुद्ध इस ज्ञान को पाकर प्रफुल्लित हुए की नहीं पर यह अवश्य हुआ की उन्होंने इसका उपदेश सबको दिया। और फिर कभी सांसारिक नहीं हुए।
एक हम हैं जो उनके इन विचारों को जानते हैं समझते हैं फिर भी दु:ख सागर की लहरों में गोते लगा रहे हैं । तृष्णा हमारी प्रमुख सहधर्मिणी बन गई है। अगर क्रियात्मक नहीं तो वैचारिक रूप से हिंसात्मक है हीं हम। तो आप हीं निर्णय दीजिए हम क्या है ?

No comments:
Post a Comment