रास्ता
निरपेक्ष भाव से सबका स्वागत है यहां ।जाने के लिए आओ, ठहरने के लिए आओ, देखने को आओ, नापने के लिए आओ, पाने के लिये आओ या खोने के लिए आप सब का स्वागत है । पाने के लिये बच्चन साहब कहते हैं "राह पकड़ तू एक चला चल पा जायेगा मधुशाला "। अर्थात् मेरा अनुकरण करो और प्राप्तव्य हाजिर है कदमों मे। यह मत सोचो चलना कहाँ से है । तू जहाँ है वहीं से चलना प्रारम्भ करो तो सही।
यदि खोना चाहते हो तो भी मेरा अनुकरण करो।आओ और मेरे मे उलझ जाओ। किंकर्तव्य विमूढ हो जाओ। निर्णय विहीन हो जाओगे, समझ ही नही पाओगे सही यही है या कोई और। जिससे पूछोगे वह भी तुम्हारी ही तरह उलझा मिलेगा। पर वह तुमसे पहले से उलझा मिलेगा। दुसरा तीसरा सब उलझे मिलेंगें।
देखने के लिये आओगे तो कभी नीरवता पाओगे कभी कोलाहल, कभी उत्सव पाओगे कभी शोक ही नसीब होगा। पर खूबसूरती मे खो जाओगे कभी उदास हो जाओगे।
ठहरना चाहोगे तो साम्राज्य के अधिपति भी हो सकते हो या रंक के रिस्तेदार।
जी हाँ श्रीमान् मैं रास्ता हूँ । मै स्वभाव से भी रास्ता हीं हूं। संस्कृत मे मुझे परिभाषित करते हुये आचार्य कहते हैं "महाजनो येन गत: स पन्था:"। अर्थात् महान लोग जो आचरण करते हैं उसे हीं पथ कहा गया है। पर हिन्दी के कवि कहते हैं "लीक छोड़ तीनो चले शायर सिंह सपूत"।
श्रीमान् जी निर्णय आपका है आप मुझे क्या मानते हैं? पर मैं हूँ तो रास्ता हीं।

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