कलम
संस्कृत के एक कोश के अनुसार "वह प्रसिद्ध वस्तु जिससे लिपि का विन्यास किया जाये" कलम कही जाती है। यह कलम सबके लिये अत्यंत मूल्यवान, आवश्यक और अनिवार्य वस्तु है। मुझे ऐसा अनुभव होता है कि इससे अक्सर भाग्य लिखा जाता है। जब कभी कोई असफल महसूस करता है तो कहता है भगवान ने मेरे भाग्य मे लिखा ही नहीं है। यहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कहते है मैने कितनों भाग्य लिखा है, और कुछ तो यहां तक कहते हैं मैने अपना भाग्य स्वयं लिखा है।
इस कलम की महिमा तो देखिये इससे स्लेट पर, दीवाल पर, होर्डिग पर लिखने का मतलब है जब मन किया मिटा दो। पर भाग्य में लिखा नहीं मिटा सकते।
कुछ लोग तो ऐसा लिखते हैं की उनको 'कलम का जादूगर' या 'कलम का सिपाही' कहा जाता है। उनकी लिखावट को लोग धरोहर मानते हैं। अच्छा मजे की बात तो देखिये की लिपि के ज्ञान के बावजूद लिखने के लिये उपयुक्त कुछ ही लोग माने जाते है। कानून की बातें वकील, समाचार को पत्रकार, आवेदन को अभ्यर्थी, कथा कहानी कविता को रचनाकार, गीत को गीतकार, पाठ्यपुस्तक को शिक्षाविद् लिखते हैं। वैसे यह सूची कुछ लम्बी है इस लिये विस्तार न करते हुये विषय पर आते हैं।
कुछ लोगों के कलम मे बड़ी ताकत होती है वे प्रसन्न होकर जिसका नाम लिख दें उसी की नौकरी पक्की और यदि रुष्ट हो जायें तो नैकरी समाप्त। इस कलम से आशिक जब हृदय रुपी उदधि मे उठती हुयी लहरों की बात लिखता है तो प्रेमी तो क्या अपरिचित मानव भी उसको अपनी ही बात मनाने लग जाता है। स्नेह सागर का पानीय निर्बंध हो आंखों से बाहर आ जाता है। कलम से जब कालिदास "अज का क्रन्दन" लिखते हैं तो हिन्दी का कवि पूछ बैठता है " कालिदास सच सच बतलाना आज रोया या तुम रोये थे"।
साथियों यह कलम सच मे अद्भुत है । लिखना शुरु करें तो रुकने का नाम नहीं लेती है।

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