8/17/2020

राजा भोज

 

परमारवंश और राजाभोज

भारतवर्ष अनेक क्षत्रिय राजाओं के इतिहास से अलङ्कृत है। इन सभी राजाओं के मध्य परमारवंशीय क्षत्रिय राजा अपना विशेष स्थान रखते हैं। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार इस वंश के प्रमुख या प्रथमपुरुष अर्बुदाचल पर वशिष्ठ के अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए थे। इन राजाओं ने मालव देश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। इन राजाओं मे कृष्ण नाम से प्रसिद्ध उपेन्द्र  नामक राजा ने नवमशताब्दी मे प्रसिद्धि प्राप्त किया। इनके वंश की परम्परा इन्हीं राजा के साथ हमारे सामने प्राप्त होती है।

मालवाधीशों की वंशपरम्परा

1. उपेन्द्र    (800-825)

2. वैरीसिंह (825-50)

3. सीयक   (850-875)

4. वाक्पति (875-914)

5. वैरीसिंह (वज्रट नाम से प्रसिद्ध)  (914-941)

6. सीयक (हर्षदेव नाम से प्रसिद्ध)  (941-976)

7. वाक्पति (मुञ्ज नाम से प्रसिद्ध)    (976-997)

8. सिन्धुराज (997-1010)

9. भोजराज  (1010-1055)

इस वंशपरम्परा में विद्वानों की एक प्रसिद्ध परम्परा है। भोजराज के चाचा राजा मुञ्ज सरस्वती  के अद्भुत उपासक थे। इनके बारे मे प्रबन्धचिन्तामणि मे एक श्लोक आया है जिसमे कहा गया है कि मुञ्ज के स्वर्गवासी हो जाने से सरस्वती  निरालम्बा हो गयी। गते मुञ्जे यशःपुञ्जे निरालम्बा सरस्वती।

भोजराज अपने समय मे एक जाज्वल्यमान नक्षत्र के समान थे। आप बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न, गुणसम्पन्न लोगों के आदर करने वाले और विद्वद्जनों के द्वारा सम्मानित रहते थे। इन्होंने कई युद्ध भी लडा था। इनके द्वारा लडे गये युद्ध मे चालुक्यराज जयसिंह के साथ युद्ध, चेदिराज गङ्गदेव के साथ युद्ध, आदिनगर राज इन्द्नदेव के साथ युद्ध और लाटराज वत्सराज के साथ लडे गये युद्ध प्रसिद्ध हैं। धारा और उज्जयिनी मे इन्होने एक सौ चार भवनों का निर्माण कराया था। पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि बल्लालसेन ने अपने भोजप्रबन्ध में राजा भोज के दान की महिमा के अद्भुत वर्णन किया है। उन्होने लिखा है कि राजा भोज के दरबार मे जब कोई कवि सुन्दर और प्रशंसनीय काव्य सुनाता था तो राजा उसे लक्ष स्वर्णमुद्रा प्रदान करते थे।

       प्रबन्धचिन्तामणि के अनुसार राजाभोज ने एक सौ चार प्रबन्ध, इतने हीं भवन और इतने हीं विरूद का निर्माण किया था। डॉ. टी. आफ्रैक्ट पण्डित के द्वारा निर्मित पुस्तकसूचीग्रन्थ (Cataloge Catalogoram) मे राजाभोज के द्वारा विरचित बाईस पुस्तकों का वर्णन किया है। डॉ. भगवती लाल राज पुरोहित ने राजाभोज का रचना विश्व नामक अपनी पुस्तक में राजाभोज के लिखे गए साठ पुस्तकों का वर्णन किया है। चन्द्रप्रभसूरी के द्वारा विरचित प्रभावकचरित में भोज के द्वारा लिखे गए पचहत्तर से अस्सी पुस्तकों का वर्णन है। उनके द्वारा लिखे गए पुस्तकों की सूची प्रकाशित और अप्रकाशित दोनो के वर्णन इस प्रकार हैं-

1.  साहित्शास्त्र

1. सरस्वतीकणठाभरण (प्र.)

2. शृङ्गारप्रकाश(प्र.)

2. काव्य

3. चम्पूरामायण (प्र.)

4. शृङ्गारमञ्जरी (प्र.)

5. अवनिकूर्मशतक (प्र.)

6. विद्याविनोद (प्र.)

7. सुभाषितप्रबन्ध (प्र.)

8. शालिकथा (अप्रकाशित)

9. महाकालीविजय (अप्रकाशित)

10. वाग्देवीस्तुति (प्र.)

3.  व्याकरण

11. सरस्वतीकण्ठाभरण (प्र.)

12. प्राकृतव्याकरण (प्र.)

4. कोष

13. नाममालिका भोजनिघण्टु (प्र.)

14. अनेकार्थकोष

15. अमरव्याख्या

5.  संगीत

16. गीतप्रकाश (अप्रकाशित)

6. इतिहास

17. सञ्जीवनी (प्र.)

7. दर्शनशास्त्र

18. तत्तवप्रकाश (प्र.)

19. सिद्धान्तसङ्ग्रह (अप्रकाशित)

20. सिद्धान्तसारपद्धति (अप्रकाशित)

21. राजार्तण्डयोगसूत्रवृत्ति (प्र.)

22. राजमार्तण्ड (वेदान्त) (अप्रकाशित)

23. शिवतत्वरत्नकलिका (अप्रकाशित)

24. तत्त्वचन्द्रिका (अप्रकाशित)

25. क्रमकमलम् (अनुपलब्ध)

8.  ज्योतिष

26. राजमार्तण्ड (प्रकाशित)

27. राजमृगाङ्क (प्रकाशित)

28. विद्वज्जनवल्लभप्रश्नज्ञान (प्रकाशित)

29. प्रश्नकेरली (अप्रकाशित)

30. आदित्यप्रतापसिद्धान्त (अनुपलब्ध)

31. भुजगबलनिबन्ध (अप्रकाशित)

32. ज्योतिः सागरः (अप्रकाशित)

33. रत्नकोष (अनुपलब्ध)

34. ग्रहभाष्यम् (अप्रकाशित)

35. भोजसामुद्रिकम् (अनुपलब्ध)

36. रमलामृतम् (अनुपलब्ध)

9. धर्मशास्त्र

37. पूर्तमार्तण्ड (अनुपलब्ध)

38. व्यवहारसमुच्चय (अनुलब्ध)

39. सिद्धान्तसारपद्धति (अनु.)

40. व्यवहारमञ्जरी (अनु.)

41. विविधविद्याविचारचतुरा (अनु.)

42. राजमार्तण्ड (अनु.)

43. बृहद्राजमार्तण्ड (अनु.)

44. रत्नमाला/रत्नरत्नावली (अनु.)

45. कामधेनु (अनुपलब्ध)

46. धर्मप्रदीप (अनु.)

47. दुगोत्सवाधिकार (अनु.)

48. प्रयोगपद्धतिरत्नावली (अनु.)

49. मनुस्मृतिभाष्यम् (अनु.)

50. धारेश्वरमिताक्षरा (अनु.)

10.           राजनीतिशास्त्र

51. नीतिनिबन्धनम् (अनु.)

52. चाणक्यराजनीतिशास्त्रम् (प्र.)

53. युक्तिकल्पतरु (प्र.)

11.             आयुर्वेद

54. चारुचर्या (प्र.)

55. राजमृगाङ्क (अप्रकाशित)

56. विश्रान्तविद्याविनोद (अप्रकाशित)

57. आयुर्वेदसर्वस्वम् (अनु.)

58. राजमार्तण्डयोगसारसङ्ग्रह (प्र.)

59. शालिहोत्रम् (प्र.)

12.           स्थापत्य

60. समराङ्गणसूत्रधार (प्र.)

61. वास्तुशास्त्रम् (अप्रकाशित)

13.           सन्देहास्पद कृतियां

62. अनिभवभाष्यम्

63. पञ्चाशिका

64. मेघमाला

65. अयसदावविवृतिः

66. वृत्तिमर्तण्ड

67. सिद्धान्तसङ्ग्रहविवृतिः

68. द्रव्यानुयोगतर्कणा

69. न्यायवार्तिकम्

70. खड्गशतकम् (प्र.)

71. अज्ञातनामा प्राकृतकाव्यम् (प्र.)

72. मीमांसा


8/09/2020

खुशियों का मूर्त रूप

संलग्न हूं ,

अपने दैनंदिन में ,

बरसों से बनी हुई

आदतों को सहेजने में ,

समय-समय पर सहेजे गए

क्रियाकलापों को पूरा करने में, 

संलग्न हूं ।



अनवरत , 

अबाध,

मुस्कुराहटों को सामने खड़ा करने में,

संलग्न हूं

कभी इसकी कभी उसकी,

खुशियों को मूर्त रूप देने में ।



 संलग्न हूं ,

 अनवरत,

अबाध ,

स्वकर्म से,

खुशियों को 

साकार बनाने के लिए ,

अपने आप को भुला कर ,

जैसे पता ही नहीं है कि ,

मैं खुद हूं ,

या ,

मैं कोई और।


8/02/2020

#संस्कृतदिवस

#संस्कृतदिवसस्य हार्दिक्यः शुभकामनाः

संस्कृतं न केवला भाषा अपितु भारतीयतायाः प्रकाशिका संस्कृतेश्च संपोषिका अपि वर्तते। एषा वैचारिकोन्नतेः साधनमपि अस्ति। मातृवत् वात्सल्यं प्रदर्शयति। बन्धुवत् सहाय्यतत्परा भवति। भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका अस्ति। पितृवत् वैचारिकोन्नतिशिखरे स्वात्मजान् द्रष्टुं ययते। मित्रवत् विवेकं जनयति। तस्मात् सर्वैः एषा अवश्यम् आश्रयणीया।

भारतीयतायाः प्रकाशिका

सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान-परम्परा की संवाहिका संस्कृत है। आहार-व्यवहार, वेष-भूषा, कर्तव्याकर्तव्य आदि का प्रकाशन इसी भाषा मे सन्निहित है।

संस्कृतेः सम्पोषिका

यह वस्तुपरक न होकर अर्थपरक भाषा है। जैसे भारतीय कालविभाजन युगपरक है सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग। प्रत्येक युग का अपना स्वरूप है जो वर्तमान को क्या होना है इसके लिये प्रयत्नशील रहने का उत्साह भरता है। ईश्वीय वर्ष ऐसा कोई स्वरूप नहीं बताता है।

वैचारिकोन्नतेः साधनम्

वैचारिकोन्नति का अर्थ है समस्त प्राणियों के प्रति आदर-भाव का होना। यह विचार इस भाषा से स्फुट रूप मे आता है। पशु-पक्षि-वन-पर्वतों को देवता का स्वरूप इसी भाषा की देन है। जिससे उनके प्रति संरक्षण और आदर-भाव स्वतः स्फुरित होता है।

मातृवत् वात्सल्यम्

माता जैसे अपने सन्तति के हमेशा अबोध मानते हुए वात्सल्य प्रदर्शित करती है ठीक उसी प्रकार संस्कृत भी अपने अध्येताओं को अत्यधिक चिन्तनशील, विवेचन के लिए प्रयासरत रहने का अवसर प्रदान करती है। यही कारण है कि कम से कम दसहजार वर्षों से यह विपुल साहित्य के रूप मे वर्तमान है।

बन्धुवत् सहाय्यतत्परा

प्रत्येक समस्या मे जिसप्रकार बन्धु सहायक होता है ठीक वैसे हीं संस्कृत भी प्रत्येक विचिकित्सा मे समुचित उत्तर के साथ प्रस्तुत हो जाती है। चाहे नये शब्दों का निर्माण हो, संगणक के लिये समुचित भाषा की आवश्यकता हो या अन्तरिक्ष की कोई बात हो। संस्कृत प्रत्येक स्थान पर सहायिका है।

भगिनीवत् प्रेमप्रकाशिका

जिसप्रकार भगिनी अपने भ्राता के समुन्नति और प्रतिष्ठा लिए प्रेमपूर्णभावों के साथ हमेशा तत्पर रहती है उसी प्रकार संस्कृत भी भौतिक और आध्यात्मिक दोनो समुन्नति का पथ प्रदर्शित करती रहती है।  

पितृवत् वैचारिकोन्नतेः प्रेरिका

यथा पिता अपने पुत्र को एक अच्छा, विचारवान्, सद्गुणसम्पन्न मनुष्य होना चाहता है उसी प्रकार यह संस्कृत भी इन्ही गुणों को व्यवस्थित करने मे प्रयासरत दिखती है। जैसे- सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान् मा प्रमद। इत्यादि।

मित्रवत् सदसद् ज्ञानं जनयति

सद् और असद् के बीच अन्तर करने वाली बुद्धि हीं विवेक पद वाच्य है। और यह बुद्धि इसी भाषा के अन्तर्गत निबद्ध साहित्य के अध्ययन से आती है। जो संसार को वस्तु न मानकर, मनुष्य को संसाधन न मानकर उसे प्रकृति मानता है।


इसप्रकार के अनेकों कारण हैं जिससे इस भाषा के प्रति सद्भावना रखना आवश्यक है। आईये मिलकर आज संस्कृत-दिवस पर संस्कृत से उपकृत होने के लिए इसका आश्रय करें।

5/20/2020

Advait/अद्वैत


अद्वैत

कीट पतङ्ग मे
हस्ति शशक मे
दनुज मनुज मे
जड चेतन मे
जीव जगत मे
दया प्रेम हो ।

भाव कुभाव से मुक्त बने हम
घृणा क्रोध को दूर करे
षण्ड पुरूष मे दर्शन पाएं,
परं देव का रूप निहारें ।

चक्र सुदर्शन प्राण दान दे,
वज्र इन्द्र का अभिमान तजे
सुधा मिले वचनों मे सबके
राजा रंक के विचार मिले।

विश्वास बने परस्पर मे
सम्मान बढे मिले सबको
ईश्वर के इस नश्वर जग मे
ईश्वर रूप दिखे सबमे।

यही अद्वैत स्वीकार मुझे
इसी को अब विस्तार मिले
अवसान मिले द्वैध द्वैत को
सर्वत्र अद्वैत अद्वैत बने।।

5/13/2020

selfie expert/ सेल्फी वाले



सेल्फी वाले ने
बहुत रुलाया
भाग्य नहीं है छोटा
ना हीं मै हूं खोटा
मेहनत का खाता हूं ।

धन सञ्चय का लोभ नहीं है
कर्मों का कोई दोष नही है
भुजबल है अनन्त अपार
मेहनत है मेरा व्यापार।

साथ बिताये हैं मैने
भवन बनाये है मैने
कभी लकडियों के गठ्ठर से
आसन सजाये हैं मैने ।

अन्न बांध कर पहुंचाया
हरा साग भी खूब खिलाया
चेहरे पर मुस्कान कि खातिर
मस्तक भी है खूब नवाया ।

कहो क्या रही कमी हमारी
खिदमत मे जो प्यारी प्यारी
दुर्दिन के साथी बनने मे
केवल चित्र लगे तुमको प्यारी ।

उपहास उडाये जाते
चित्र फैलाये जाते हो
देते हो एक समय का
कहते ऐसे, जैसे ,
पालक हो जीवन भर का ।

उम्मीद विहीन नहीं हूं मै
उत्साह भरा है अन्तस् मे,
आश्रित हमे तुम मान रहे हो
अपने पर इतरा रहे हो ।
पर हम बिन तुम अधूरे हो
हम से ही तो पूरे हो ।
कार्य साधक और सुविधा कर्ता
जो चाहो सब हम से होता ।



5/11/2020

दिहाड़ी/ daily wagers


।। दिहाड़ी मजदूर हूँ आपका ।।


इस तरह क्यों खड़े हो
पथ-बाधक बनकर,
अपशकुन का साधक बनकर।

जी हुजूर!
तनिक तरस जाइये,
मुझपर रहम खाइये,
दो रोटी तो देते जाइये।

पिता पालक होता है
अपने बच्चे को बताने के लिये।
पति रक्षक होता है
भार्या को समझाने के लिये।
आदमी हूं
यह स्वयं को जताने के लिये,
मुझे दो रोटी तो देते जाइये।

नहीं भर सकता पेट
मिट्टी से,
हवा से,
घास से,
जंगली पत्तों से,
कपडों के कुतरने से
कूड़े के ढ़ेर को निरखने से,
आप को सुनने से।
आदमी हूं साहब
मुझे दो रोटी तो देते जाइये।

आज सडक मे पडा हूं ,
आप के कदमों मे अडा हूं,
दैन्यता से घिरा हूं ,
पर कुछ विचारों मे बडा हूं ।
हूजूर कुछ नजर डालिये
मुझे यहां से निकालिये,
क्योंकि..........

निर्माता हूं
बैंक का
पर खाता नहीं है उसमे।
ईटों को जोड़ कर
बनाए हैं सभी कार्यालय मैने
पर कर्मचारी नहीं हूं कहीं का।


मैने बनाये हैं
आप की सुगमता के लिये
यह उन्नत कोटि का पथ
रहने के लि उत्तम घर
आप के स्वाद के लिये काट कर लाया हूं
अच्छे अनाज की फलियां
बगों के पके मिठे फल
चमकीले कपडों के लिये
सर्वोत्तम कपास
अनेक फूलों से बनाया
चटख रंग
ताकि आप अपने को गर्वित समझ सकें।

अरे मै पूछता हूं
क्यों भरते हो दम्भ
मेरे लिये इतना करने का
सरकार बनाती है
सड़कें
मिलों मे बनते हैं कपड़े
किसान उगाता है
अनाज, फल और सब्जियां।
तुमने कैसे किया, दिया इतना मुझे प्यार।

हुजूर
ठीक कहा आपने
मै, ना हीं
सरकार हूं
मालिक हूं कंपनी का
या फिर किसान हूं
इस भारत का।

पर
मै हीं करता हूं
काम
सरकार का,
कंपनी के मालिक का,
किसान का।

क्योंकि मै दिहाड़ी मजदूर हूँ ।
हूजर!
आपका आपका और आपका ।।




5/06/2020

कोविड-19 और आम जन की आवश्यकता



कोविड वैसे तो विश्व के लिये अत्यन्त दुःखद दुर्घटना है । हजारों की संख्या मे लोगों के प्राण तो ले ही रहा है लाखों लोग भुखमरी के कगार पर हैं या भुखमरी के शिकार हैं । पर भारत के परिप्रेक्ष्य मे समाज के वे सभी लोग जो मजदूर वर्ग के हैं, जो निम्न मध्यम श्रेणी के हैं या मध्यम श्रेणी के हैं वे सभी दैनिक आवश्यकता को भी पूरी करने मे वर्तमान मे अक्षम हैं । चाहे वे जिस भी संस्थान मे कार्य कर रहे हों वे सभी संस्थान आज वीरान पडे हैं। कार्य नहीं है । सुविधा नहीं है कार्य प्रारम्भ करने की । सुरक्षा प्रदान करने की। अतः कार्य प्रारम्भ करने की इच्छाशक्ति के होते हुये भी सभी संस्थान के मुखिया संशयापन्न हैं । क्या करें के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है।


थोडी बात सरकार की कर लेते हैं । सरकारें जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहीं हैं । सरकार की जिम्मेदारी है अपने लोगों के प्राणों की रक्षा करना । सरकार कर रही है- लॉक डाउन लागू कर के। भूखमरी को कम करने के लिये लोगों को आर्थिक मदद प्रदान करते हुये अन्नभंडार के अनाजों तक लोगों तक पहुंचा रही है सरकार । यह सरकार की जिम्मेदारी भी है । इसी लिये तो सरकार होती है । सरकार पहले टैक्स के रूप मे अमीरों से पैसे लेती है फिर जिनको आवश्यकता होती है अर्थात् जो अपनी रोजमर्रा की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते हैं उनकी सहायता करती है। अतः सरकार उपरोक्त व्यवस्था कर रही है । पर 130 करोड की आबादी मे प्रत्यक्ष कर दाता हैं कि कितने ? प्रतिशत मे देखा जाय तो 10 से 15 प्रतिशत । बाकि अप्रत्यक्ष कर दाता हैं। इस प्रकार सरकार के पास जो पैसा आता है वह एक सीमित मात्रा मे है । अन्नभंडार भी सरकार के पास जनसंख्या के हिसाब से अत्यनत अल्प हैं । बाकी का अन्न किसान और व्यपारियों के पास है। किसान का अन्न सरकार क्रय नही कर पाती है अतः बहुत मात्रा मे वह किसान के पास या व्यपारियों के पास चला जाता है ।   इस कारण से दिल खोलकर गरीबों की मदद हेतु बनी सरकारें भी अब गरीबों की मदद के लिये अपने हाथ खडी करने के कगार पर आ गई हैं । और अब उनको भी लॉकडाउन रास नहीं आ रहा है ।  आना भी नहीं चाहिये । पैसे समाप्त हो जाने और अन्न भंडार खाली हो जाने की स्थिति मे सामाजिक विद्रोह की परिस्थिति बन जायेगी। अतः कुछ व्यापारिक संस्थानों कलकारखानों को चालू करना हीं पडेगा । जहां कामगार काम पर लौटे और अपनी मदद करते हुये सरकारी मदद की आस से निराश होने की तरफ अग्रसर हो सकें । पर क्या वे सभी लोग जिन्हे दिहाडी मजदूर कहा जाता है जो आज तक सरकारी मदद को सोचे बिना अपनी आजिविका का संचालन सुख पूर्वक कर रहे थे काम पर लौट पायेंगे कहा नहीं जा सकता है ।


यह सभी कामगार वर्ग 80 प्रतिशत विस्थापित के रूप मे पाया जाता है । अब वे सभी अपने गृह नगर को लौट गये हैं या लौटने लगे हैं । पर वहां जहां गये हैं वहां न कलकरखाने हैं, न कंस्ट्रकशन कार्य है, न बडे बडे कार्यालय हैं, न मॉल हैं और ना ही भंडार घर हैं जहां साफ सफाई, बोझ उठाना, कुदाल चलाना, रंगाई, सुरक्षा व्यवस्था आदि का कार्य कर सकें। अगर यह सब रहता तो वे विस्थापित ही क्यों होते ? अतः वे कैसे आजिविकोपार्जन करेंगे पता नहीं ।


आइये कुछ विचार करते हैं कि इस भूखमरी की समस्या का निदान क्या है ? निदान शब्द यहां अपने मौलिक एवं प्रचलित दोनो अर्थों के लिये रखा हूं । निदान का मौलिक अर्थ है कारण और प्रचलित अर्थ है समाधान । अतः कारणात्मक निदान पर पहले विचार करते हैं । जब तक भारत मे मशीनी युग का प्रभाव अपने पूर्णरूप मे नहीं था यह विस्थापन कुछ प्रतिशत हीं था । प्रत्येक गांव, ब्लाक, अनुमण्डल, प्रमण्डल और राज्य अपने यहां कुछ न कुछ उत्पादन कार्य करता था । यही कारण है कि राज्य के बहुतेरे स्थान अपने लिये एक विशेष पहचान रखते थे । अगर उत्तर-प्रदेश को हीं एक न्यादर्श के रूप मे लिया जाय तो यहां के प्रमुख शहर जैसे- 1-अलीगढ़ मे  ताला निर्माण, 2-आगरा और कानपुर मे  चमड़े के उत्पाद, 3-आजमगढ़ मे काली मिट्टी की कलाकृति, 4- गाजियाबाद मे यांत्रिकी उत्पाद, 5-गोरखपुर मे मिट्टी के बर्तन (टेराकोटा), 6- चंदौली मीर्जापुर मे  जरी-जरदोजी और कालीन, 7-जौनपुर  मे ऊनी दरी, 9- फीरोजाबाद मे कांच के उत्पाद, 10- लखनऊ मे चिकनकारी और जरी-जरदोजी, 11- वाराणसी मे रेशम उत्पाद, 12- मुरादाबाद और हाथरस मे पीतल के बर्तन निर्माण हेतु प्रसिद्ध स्थान हैं । यही हाल इस देश के अन्य राज्यों का भी था । ग्रामीण स्तर पर लकडी के कार्य, मिट्टी के बर्तन निर्माण के कार्य, भवन निर्माण कार्य आदि आज भी किये हीं जाते हैं । इस प्रकार देखा जाय तो उद्योगों की तरफ सरकार का उन्मुखीकरण, चमकीलापन का आकर्षण, अत्यधिक निर्माण हेतु मशीनी वातावरण की सुलभता का अभाव आंचलिक उद्योग या लघु-उद्योग को नकारने का प्रमुख कारण बना । जिसके कारण उत्पादन तो बढा पर घरेलू उद्योग बन्द हो गये और मजदूरी प्रथा का वर्चस्व आज देश की प्रमुख समस्या बनी हुयी है । काम की तलाश मे विस्थापन अपने चरम पर पहुंच गया है । यह विस्थापन केवल भारत के अन्दर हीं नही है । भारत के कामगारों का भारत के बाहर भी होने लगा है । खाडी देश और अमरीका तो भारतीयों के प्रमुख कार्यस्थल बन गये हैं । अतः इस विस्थापन को रोकने हेतु विचार करना आवश्यक हो जाता है ।


अतः सरकार फ्री की सुविधा प्रदान करती रहेगी । पर आलस्य प्रधान देश मे विस्थापन कभी नहीं रुकेगा । समाधानात्मक निदान पर यदि विचार करें तो विभिन्न सरकारों को चाहिये कि वे भारत के प्रसिद्ध या कम प्रसिद्ध उन स्थानों की पहचान करे जो स्थानीय तौर पर कामगारों को काम प्रदान कर सकें । उन घरेलू उद्योगों को पुनरुज्जीवित करने का इस प्रकार प्रयास किया जाय की  इससे उन स्थानों के अधिकांश लोगों को काम प्राप्त हो सके । प्रायः सब की मूलभूत जरुरते वहीं पूरी हो जाया करेंगी । महामारी तो छोडिये महोदय, सामान्य दिवसों मे भी जनसंख्या के अनुपात मे रोजगार का सृजन अल्पतर हीं रहेगा और खाने के लाले और प्राणों के लाले दोनो पडते ही रहेंगे । सरकार हमेशा ही विफल होगी और सामाजिक विद्रोह, वैमनस्य, व्यक्तिगत भेद-भाव आदि अनन्त काल तक इस धराधाम मे अभिव्याप्त रहेंगें । सरकार रिंगमास्टर का रोल अदा करेगी। निम्न मध्यम वर्ग गरीब बनेगा, गरीब दिहाडी, अमीर धनपति । सरकार की तरफ स्वाति बूंद की आस लगाये भारत की आम जनता अपने प्राणोत्सर्ग की ओर अग्रसर होती ही रहेगी ।


शिक्षक

💐सबको शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।💐 शिक्षक एक ऐसा अभिधान है जो हम सभी के जीवन में अपना अमूल्य स्थान रखता है। वैसे तो हम रोज कुछ ना क...