5/11/2020

दिहाड़ी/ daily wagers


।। दिहाड़ी मजदूर हूँ आपका ।।


इस तरह क्यों खड़े हो
पथ-बाधक बनकर,
अपशकुन का साधक बनकर।

जी हुजूर!
तनिक तरस जाइये,
मुझपर रहम खाइये,
दो रोटी तो देते जाइये।

पिता पालक होता है
अपने बच्चे को बताने के लिये।
पति रक्षक होता है
भार्या को समझाने के लिये।
आदमी हूं
यह स्वयं को जताने के लिये,
मुझे दो रोटी तो देते जाइये।

नहीं भर सकता पेट
मिट्टी से,
हवा से,
घास से,
जंगली पत्तों से,
कपडों के कुतरने से
कूड़े के ढ़ेर को निरखने से,
आप को सुनने से।
आदमी हूं साहब
मुझे दो रोटी तो देते जाइये।

आज सडक मे पडा हूं ,
आप के कदमों मे अडा हूं,
दैन्यता से घिरा हूं ,
पर कुछ विचारों मे बडा हूं ।
हूजूर कुछ नजर डालिये
मुझे यहां से निकालिये,
क्योंकि..........

निर्माता हूं
बैंक का
पर खाता नहीं है उसमे।
ईटों को जोड़ कर
बनाए हैं सभी कार्यालय मैने
पर कर्मचारी नहीं हूं कहीं का।


मैने बनाये हैं
आप की सुगमता के लिये
यह उन्नत कोटि का पथ
रहने के लि उत्तम घर
आप के स्वाद के लिये काट कर लाया हूं
अच्छे अनाज की फलियां
बगों के पके मिठे फल
चमकीले कपडों के लिये
सर्वोत्तम कपास
अनेक फूलों से बनाया
चटख रंग
ताकि आप अपने को गर्वित समझ सकें।

अरे मै पूछता हूं
क्यों भरते हो दम्भ
मेरे लिये इतना करने का
सरकार बनाती है
सड़कें
मिलों मे बनते हैं कपड़े
किसान उगाता है
अनाज, फल और सब्जियां।
तुमने कैसे किया, दिया इतना मुझे प्यार।

हुजूर
ठीक कहा आपने
मै, ना हीं
सरकार हूं
मालिक हूं कंपनी का
या फिर किसान हूं
इस भारत का।

पर
मै हीं करता हूं
काम
सरकार का,
कंपनी के मालिक का,
किसान का।

क्योंकि मै दिहाड़ी मजदूर हूँ ।
हूजर!
आपका आपका और आपका ।।




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