।। दिहाड़ी मजदूर हूँ आपका ।।
इस
तरह क्यों खड़े हो
पथ-बाधक
बनकर,
अपशकुन
का साधक बनकर।
जी हुजूर!
तनिक
तरस जाइये,
मुझपर
रहम खाइये,
दो
रोटी तो देते जाइये।
पिता
पालक होता है
अपने
बच्चे को बताने के लिये।
पति
रक्षक होता है
भार्या
को समझाने के लिये।
आदमी
हूं
यह
स्वयं को जताने के लिये,
मुझे
दो रोटी तो देते जाइये।
नहीं
भर सकता पेट
मिट्टी
से,
हवा
से,
घास
से,
जंगली
पत्तों से,
कपडों
के कुतरने से
कूड़े
के ढ़ेर को निरखने से,
आप
को सुनने से।
आदमी
हूं साहब
मुझे
दो रोटी तो देते जाइये।
आज सडक मे पडा हूं ,
आप के कदमों मे अडा हूं,
दैन्यता से घिरा हूं ,
पर कुछ विचारों मे बडा हूं ।
हूजूर कुछ नजर डालिये
मुझे यहां से निकालिये,
क्योंकि..........
निर्माता
हूं
बैंक
का
पर
खाता नहीं है उसमे।
ईटों
को जोड़ कर
बनाए
हैं सभी कार्यालय मैने
पर
कर्मचारी नहीं हूं कहीं का।
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